ज़िंदगी की सरजमीं पर...
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी!!!
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी!!!

इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी!!!

आज तड़के सुबह हो गयी,
आज सांसे भी हैं चल रही,
सोचने की फ़ुरसत नहीं,
रोटी कमानी है आज की,
क्योंकि?
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

आज तड़के सुबह हो गयी,
आज सुबह जल्दी हो गयी,
काम से रात क़मर टूट गयी,
फिर भी कमानी तो है रोटी,
क्योंकि?
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

कल रात नींद देर से सोयी,
आज सुबह से चिंता होई,
आज काम पर है छुट्टी,
आज कैसे कमायेंगे दिहाड़ी,
क्योंकि?
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

सुबह से आंख फड़क रही,
कौन महामारी आन पड़ी,
मुंह पे बंधा हुआ हैं फेंटा,
सांस मुश्क़िल से आ रही,
पर जीविका तो है चलानी,
क्योंकि,
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

आज तड़के ही नींद खुल गयी,
कल से कुछ भी खाया नहीं,
भूख लगती ही नहीं, दिखती भी,
निवाले में मिल जाये कुछ भी,
मालूम है जानवर बनाये देती,
क्योंकि,
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

आज तड़के सोच ये रही,
आख़िर मरते तो हैं सभी,
कुछ खा के, ज़्यादे भूखे ही,
भूखे मगर रोज़ मरते हैं जी,
क्या ये फ़र्क़ है काफ़ी नहीं,
ग़रीब को मगर माफ़ी नहीं,
क्योंकि,
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

तड़के सुबह में स्याही रही,
आज हिम्मत टूट सी गयी,
आज दर्द की नदिया बही,
उस दरिया में सूरत देखी,
सूरत साफ़  दिखी नहीं,
चेहरे पे बड़ी गर्द थी टिकी,
केवल पसीने से है धुलती,
क्योंकि,
इक और दिन ज़िंदगी जो रह गयी,

सुबह आज बड़ी अचानक हुई,
बात ही ऐसी भयानक हुई,
भूख हमसे ही पूछ पड़ी,
बड़े ही बे ग़ैरत हो जी,
ग़र मुझे मिटाना था नहीं,
फिर मुझको पाला क्यों ही?
बस समझ सके नाराज़गी,
देर तक हंसती रही मजबूरी,
क्योंकि,
इक और दिन ज़िंदगी फिर रही नहीं…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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