दिन गिनते गिनते रात भई,
रात भी ना कोई बात हुई,
रात गुज़री फिर रात हुई,
ना जाने कब वो रात हुई,
वक़्त गुज़रा रात ना गई,
सारा दिन फिर रात रही,
अनमनी उधड़ी उधड़ी सी,
आंखों आंखों में कट गई,
थी मौत बिखरी पड़ी हुई,
यहां वहां जहां भी देखी,
लहू बह रहा जैसे पानी,
कहानी ऐसी सुनी ना गई,
सुरंगों में ज़िंदगी पड़ी हुई,
जब बाहर देखने को हुई,
काले ग़ुबारों में सन गई,
धूप से उसकी ठन गई,
स्याही अंदर तक थी भरी,
स्याह बाहर भी कर गई,
बम धमाकों में उड़ गई,
गोली हर तरफ़ चल रही,
बाहर अंदर वो इक हुई,
मन के अंदर भी बैठ गई,
जंग जाने किसने जीती,
इंसानियत जंग हार गई,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Heart touching
Jang heart touching Dada