कहा मेरे बच्चे ने,
तुम अब बूढ़े हो चले,
कुछ दो दशक पहले,
अपने पिता के लिये,
यही कहा था मैंने,
सोचता हूं अब मैं,
क्या सोचते होंगे वो,
कैफ़ियत क्या होगी,
जब कहा था मैंने,
जो कहा मेरे बच्चे ने,
अभी मैं सोचता हूं ये,
“बूढ़ा” कहते हैं किसे?
हज़ारों तजुर्बे हों जिये,
वक़्त का नायाब पानी,
या चढ़ा हो जिस पे!
मन से जो मान गया हो,
चादर जो तान गया हो,
ज़िंदगी जिसे नहीं जिये,
जिसने रसप्याले नहीं पिये,
बड़ा हो या वो जवां ठहरे,
मनोकामना ज़िंदा है,
हर इक तमन्ना ज़िंदा है,
चुलबुलाहट जो है तुममे,
वो बदली नहीं कभी हममें,
बड़े ज़रूर पर बूढ़े नहीं हैं,
जाओ कह दो ये सबसे,
कहा हमने अपने बच्चे से,
ना बूढ़े हुए पिता जी मेरे,
ना ही हम कभी बूढ़े होंगे,
तन से थक जाएं भले,
मन से हम मनमीत रहेंगे…
बड़े तो हम शुरू से थे,
बूढ़े मगर नहीं होंगे…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Too good
Amazing specially from “Manokamna zinda ha…….
बहुत अच्छी कविता
Sahi baat Dada ham sab ne he kabhi na kabhi Budha bola tha ya ye ki zamana Badal gaya hai
बड़े तो हम शुरू से थे,
बूढ़े मगर नहीं होंगे !!