ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बूढ़े!!!
बूढ़े!!!

बूढ़े!!!

कहा मेरे बच्चे ने,
तुम अब बूढ़े हो चले,
कुछ दो दशक पहले,
अपने पिता के लिये,
यही कहा था मैंने,

सोचता हूं अब मैं,
क्या सोचते होंगे वो,
कैफ़ियत क्या होगी,
जब कहा था मैंने,
जो कहा मेरे बच्चे ने,

अभी मैं सोचता हूं ये,
“बूढ़ा” कहते हैं किसे?
हज़ारों तजुर्बे हों जिये,
वक़्त का नायाब पानी,
या चढ़ा हो जिस पे!

मन से जो मान गया हो,
चादर जो तान गया हो,
ज़िंदगी जिसे नहीं जिये,
जिसने रसप्याले नहीं पिये,
बड़ा हो या वो जवां ठहरे,

मनोकामना ज़िंदा है,
हर इक तमन्ना ज़िंदा है,
चुलबुलाहट जो है तुममे,
वो बदली नहीं कभी हममें,
बड़े ज़रूर पर बूढ़े नहीं हैं,

जाओ कह दो ये सबसे,
कहा हमने अपने बच्चे से,
ना बूढ़े हुए पिता जी मेरे,
ना ही हम कभी बूढ़े होंगे,
तन से थक जाएं भले,
मन से हम मनमीत रहेंगे…
बड़े तो हम शुरू से थे,
बूढ़े मगर नहीं होंगे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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