रेत के टीलों का पहाड़ बना डाला,
लगा जो धसने, बवाल मचा डाला,
पत्थर को तौलते हो रेत से मगर,
घिस घिस उसे रेतीला बना डाला,
घर सजा डाले पत्थरों को काटकर,
और तो और ताजमहल बना डाला,
खड़े कर दिये हैं ताबूत लंबे लंबे ,
और उनमें इंसान को बसा डाला,
घर लगने लगे हैं ताबूत की तरह,
सांस भरने को इक छेद बना डाला,
खिड़कियों पे चढ़ा दी हैं सलाखें,
दरवाज़ों को पहरेदार बना डाला,
ऊपर की मंज़िल से देखना फ़िज़ूल,
अच्छे भले इंसां को अदना बना डाला,
मसखरी उड़ रही हर तरह इंसान की,
इंसान ने इंसान को नमूना बना डाला,
ख़ौफ़ज़दा होने से अब होगा क्या,
ऊंची इमारतों ने सब बौना बना डाला,
सौ मंज़िला इमारत आसमां छू रही,
और ज़मीन को इक क़तरा बना डाला,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava