आसमां से गहरी समंदर से ऊंची,
हाय, ये परेशानियां हैं कैसी कैसी,
कहीं सुलझी हुई कहीं मसनुई सी,
सीधी उलझी सुबहें अच्छी लगती,
उसने कहा ज़मीं तौल दो थोड़ी सी,
सौदा करने को ज़मीं बची ही नहीं,
कल रात सपनों में बचा के रख ली,
ख़ुश रहने की आदत अब रही नहीं,
उम्र चढ़ती गयी जिल्द उतरती रही,
क़िताब पेबन्दों से कैसी सजती गयी,
अक़्ल भरते भरते भर गया जब जी,
यूं, शुरुआत ज़िंदगी समझने की हुई,
सफ़े पे तजुर्बे छपते रहे हर रोज़ ही,
मगर क़िताब अधूरी की अधूरी रही,
इक दिन, इक पल, पूछ बैठा यूंही,
वक़्त! कहकशां में और होता है कहीं?
कुर्सी, मेज़, सब हैं वैसे के वैसे ही,
इक ज़िंदगी है जो ख़र्च होती रही,
ना होता वक़्त ना गुज़रते लम्हें ही,
दिल धड़कने में रुकावटें रहती नहीं,
साफ़ हो के अंधेरा, रौशनी देने लगा,
इतना सुफ़ेद, कि आंखें खुलती नहीं,
अच्छा हुआ के ग़फ़लत में है ज़िंदगी,
असलियत देख के ख़ासी उलझन हुई,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Lovely! “Accha hua…..uljhan huyi”
is metaphor to human life.