ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सजाकर!!!
सजाकर!!!

सजाकर!!!

ख़्वाबों को ज़रा सजा कर रखिये,
बेतरतीब ख़्वाबों से उलझने है बड़ी,

दीवार पे टंगे हैं कई ख़्वाब, मगर,
ताबीर में उनके, अड़चने हैं खड़ी,

जाल बुनती हैं ज़माने की तस्वीरें,
बचने की तरक़ीबें ही आड़े अड़ी,

बुरे वक़्त में क़ायम रहे ईमान,
ज़रूरत है आज की, सबसे बड़ी,

चलता रहे ज़िंदगी का ताना बाना,
बड़ी छोटी सी है, जीवन की घड़ी,

वैसे तो बख़्शी है नियामतें उसने,
कोई परेशां है कि परेशानियां नहीं,

उलझने बनती बिगड़ती रहती हैं,
इसमें ख़फ़ा होने की ज़रूरत नहीं,

आओ मिल कर तोड़ें वो आशियां,
रहने वालों ने जिसकी क़द्र नहीं की,

फ़र्क़ है फ़र्ज़ को क़र्ज़ समझने में,
चलिये ये खुशफ़हमी टूटी तो सही,

घर सजाया मकां के ख़यालों से,
मुहब्बत सजा कर ताक पर रख दी,

मुहब्बत, तालीम से समझने वालों ने,
सिवाय दिल के, सभी की क़द्र की,

करते भी तो क्या करते, ये सोच के
मासूम दिल ने ख़ुद को मुआफ़ी दे दी,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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