ज़िंदगी की सरजमीं पर...
लखनऊ : शान अवध की!!!
लखनऊ : शान अवध की!!!

लखनऊ : शान अवध की!!!

यहां  इमारतें हैं बोलती,
यहां  शरारतें हैं डोलती,
यहां  सूरतें हैं चहकती,
यहां मुहब्बतें हैं महकती,

हां, ये शान है लखनऊ की,

फ़लसफ़िये हैं हर गली
जिन्हें ज़िंदगी खड़ी मिली,
इत्मीनान से है भरी भरी,
यहां किसी को नहीं जल्दी,

हां, ये शान है लखनऊ की,

नज़र नज़र से बात करती,
अदब से पलकें खुला करतीं,
नाज़ुक है यहां कली कली,
बर्दाश्त नहीं यहां, बेअदबी,

हां, ये शान है लखनऊ की,

ये लखनऊ की सरज़मीं,
इसे किसी की क्या कमी,
नज़ाकत यहां पली बढ़ी,
दादरा कजरी औ ठुमरी,

हां, ये शान है लखनऊ की,

सुबह सुबह की गोमती,
पे धुंध  भीनी सी चढ़ी,
किनारे यूं लगे सोचने,
नदी है के अनारकली,

हां, ये शान है लखनऊ की,

लखनऊ से आप निकले,
पर लखनऊ है आप में,
हर वक़्त ऋतु बसंत की,
शेख़ ओ बरहमन की नगरी,

हां, ये शान है लखनऊ की,

दरख़्त बैठती धूप भोर की,
दिन चढ़ती भाव विभोर सी,
शाम लगती सुंदर अघोर सी,
हर रात है चंदा चकोर की,

हां, ये शान है लखनऊ की,

यहां लचकती है इमरती,
चाशनी में रहती घुलती,
कुछ क़वायदें है यहां की,
अपने से पहले आप ही,

हां, ये शान है लखनऊ की,

टहलना यहां है रस भरी,
गंज की शाम, या दोपहरी,
मलाई के पान की गिलौड़ी,
अमा! शहर है या मौसीक़ी,

हां, ये शान है लखनऊ की,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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