ज़िंदगी की सरजमीं पर...
हर इक शक्ति-रूपेण के नाम!!!
हर इक शक्ति-रूपेण के नाम!!!

हर इक शक्ति-रूपेण के नाम!!!

तेरे जैसा नहीं कोई, रखना यक़ीं चाहिये,
जो तू कहना चाहे खुल के कहना चाहिये,

वजूद तेरा इसलिए नहीं के रहे बंध के,
ग़र हो मंज़ूर, बंधन ख़ुद के बनाने चाहिये,

ज़माना निकल गया है अब बहुत आगे,
नाहक ही क्योंकर पीछे मुड़ के झांकिये,

चूल्हे चक्की की फ़िक्र क्यों हो बस तुझे,
काम है ये घर का, घर को करना चाहिये,

वैसे तो है ग़ैर मुमकिन पर अगर ये हो भी,
इस दौर के आयामों को समझना चाहिये,

तुम हो बेशक़ीमती, यक़ीन होना चाहिये,
अपने हाशिये पे ज़िंदगी परखनी चाहिये,

ख़ुद से ख़ुद को वाबस्ता कर के देखिये,
ख़ुद के फ़ैसलों का स्वाद चखना चाहिये,

क्योंकर सवाल उठे तुम्हारी अस्मिता पे,
ऐसे हर सवाल पर बवाल उठना चाहिये,

हर बार, बार बार क्यों करो समझौता,
पैमाइशें तुम्हें, ख़ुद तय करनी चाहिये,

खोखला करता है टोक टोक के ज़माना
खुल के उड़ने का हौसला रखना चाहिये,

क्यों चाहिये तालीम तुझे तालीम के बाद,
हाक़िम नहीं, हाथ बटाने वाला चाहिये,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

12 Comments

  1. ललित बेदी

    यह नजम 50 से 60 उम्र वालों के लिए एकदम सटीक बैठती है।
    अगर इसे नीचे से ऊपर यानी कि रिवर्स पूरा उल्टा में भी पड़े तब भी यह बहुत ही बढ़िया बनती है करके देखिएगा।
    मनीष भाई आपके नगीनों में एक मोती और बढ़ गया।।

  2. Rachna

    सच मे,यह शक्ति की सार्थकता है कि वह यथार्थ की पृष्ठ भूमि पर भी, मानव स्वभाव की कसौटी पर खरी उभरती है!

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