ज़िंदगी की सरजमीं पर...
चाँद तारे!!!
चाँद तारे!!!

चाँद तारे!!!

कभी चांद तारों की बात होती है,
कभी इन नज़ारों की बात होती है,

यूं दिल करता है के कह दूं तुझसे,
तुझे तुझसे चुराने की बात होती है,

क्या पता है क्या, है शायद हवा,
चराग़ों को बुझाने की बात होती है,

तब बाहर से झांकती स्याही रोती है,
जब चांदनी फैलाने की बात होती है,

सपने जब कुछ बुन नहीं पाते, तब,
स्याह रातें बुझाने की बात होती है,

मुक़्क़मल मुहब्बत कम ही होती है,
अक़्सर इश्क़ में जुदाई साथ होती है,

कनखियों से बार बार देखना उनका,
उम्मीद भी इक चौथाई साथ होती है,

दरवाज़े की ओट से नज़र का मिलना,
बहते अश्क़ों संग रुसवाई भी बहती है,

मरमराते होंठों का कंपकंपाना ऐसे,
जैसे उमर ख़य्याम की रुबाई होती है,

आसमाँ पे टांक के कुछ सितारों को,
मनुशरद से उसपार की बात होती है,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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