ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बेशुमार
बेशुमार

बेशुमार

हर मोड़ पे इंतेज़ार करता हूं,
तुझे बेशुमार प्यार मैं करता हूं,
ना देख यूं तीखी नज़रों से,
मैं घायल हो जाया करता हूं,

तीर ए नीमक़श क्या कहिये,
देख  देख   बौराया करता हूं,
मैं हद से पार क्यों ना जाऊं,
तुझे उसपार जो पाया करता हूं,

जब तुझे रिझाया करता हूं,
तुझसे ही छुपाया करता हूं,
अक़्सर देखा है मैंने, फिर,
क़ायल  हो जाया करता हूं,

जिस चोट की कोई ओट नहीं,
उसमें इक टीस और दर्द सही,
इक बार जो देख नज़रे भर के,
दर्द है क्या, भूल जाया करता हूं,

इक गीत मैं बुनता रचता हूं,
अक़्सर ही सुनता रहता हूं,
जो तू है तो रूह है पास मेरे,
जाने क्यों दोहराया करता हूं,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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