ज़िंदगी की सरजमीं पर...
वक़्त और हम!!!
वक़्त और हम!!!

वक़्त और हम!!!

अलग ही अंदाज़-ए-बयाँ है…

क्या ये वक़्त चल रहा है,
के वक़्त मुसलसल थमा है,
वक़्त के हाथ में आईना है,
देखता है कि अक़्स अपना है,
सोचता हूं, क्या ये सपना है,
और “मनुशरद” हैं पूछ रहे,
क्या ये मसाइलों का मामला है?

वक़्त रुका, तो चलता क्या है,
वक़्त झुका तो मसला क्या है,
उसे चलते देखा नहीं किसी ने,
उसे झुकते देखा नहीं किसी ने,
तो जो थमा है क्या वो लम्हा है,
दूर से लगे के आसमां झुका है,
सुकूं में भी दरिया उफ़न रहा है,
ग़र ये दरिया है गुज़रे पलों का,
तो इतना दहल क्यों रहा है?

गुज़रा क्या है? वक़्त?
पर वक़्त तो इंसानी बला है,
इंसान के सिवा किसने कहा,
के रात औ दिन के होने में,
वक़्त ही है जो गुज़र रहा है?
कुछ गुज़र भी रहा है या यूं है,
के शरीर खोखला हो रहा है,
गरम था अब नरम हो रहा है,
यूं कहें के शरीर गुज़र रहा है,

सोचता हूं के मेरा डर क्या है?
के मैं जिस खाल में रह रहा हूं,
वो आहिस्ते छोड़ रही है मुझे,
सांसे, चमड़ी भरना चाहती नहीं,
डरा हूं के चमड़ी चलेगी कि नहीं,
और डरा हुआ हूं के बाद इसके,
रहूंगा कहां, कहूंगा मकां किसे,
मकां मेरी सांसों का या किसका?
ये भी पता नहीं, इसलिये हूं मैं डरा,

पर ये डर क्यों है? क्या है?
देखा है सांसों को जाते हुए,
और फिर ना कभी आते हुए,
तो क्या ये डर है अंजान का,
या फिर डर उस सोपान का?
ये डर है ना जान पाने का,
के जाना कहां है बाद इसके,
इस खाल से निकल के,
जाना है किसी और खाल में,
या है ये बस मेरे ख़याल में?

के खेल ख़त्म जब हम ख़त्म,
ये सोच सोच के दीवाने हुए हम,
इसे वक़्त कहें या गुज़र रहे हम,
कौन सोचे के क्या होना है आगे,
कौन जाने क्या छोड़ आये पीछे,
कितने ही सवालों से घिरे हुए हम,
पर क्या ये वक़्त बता पायेगा?
या यूं के पता ही ना चल पायेगा,
गुज़रा जो था, क्या वो था वक़्त?
या थे हम???

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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