पानी पे पांव के निशा चाहते हैं,
ख़ुद से ना जाने हम क्या चाहते हैं
ख्वाहिशें बेहिसाब के क्या कहें,
उसी में रचा बसा औ गुंधा चाहते हैं,
इधर ज़िंदगी कह रही है हमसे,
सोच में क्योंकर ख़लल चाहते हैं,
है यकीं हमें, के इल्म है हम में,
ज़िंदगी को बेहद सरल चाहते हैं,
मय में झूमें के हम लय मे झूमें,
तरन्नुम का दरिया तरल चाहते हैं,
ली है हमने अहद, ये सोच कर,
उस दर को हम दरअसल चाहते हैं,
कब से बात बैठ गयी है दिल में,
यकीं करने में हम पहल चाहते हैं,
सब है भला, बुरा कुछ नहीं है,
इस फ़लसफ़े की अक़ल चाहते हैं,
नशा आता है हमें इन नज़ारों में,
ऐसे सुरूर की हम नक़ल चाहते हैं,
मनुशरद को इश्क़ है ज़िंदगी से,
हर पल वो इक हलचल चाहते हैं,
रात रात जगा के रखा है ख़ुद को,
जो उससे मिला दे वो पल चाहते हैं,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत खूबसूरत और गहरी सोच से भरी हुई कविता है! यह शब्दों का ऐसा ताना-बाना है, जो इंसानी ख्वाहिशों, ज़िंदगी की सरलता, यकीन, और इश्क़ के मायनों को बड़ी ही शायराना अंदाज़ में बयां करता है।
“यकीं करने में हम पहल चाहते हैं” – यह पंक्ति खासतौर पर बहुत असरदार लगी, क्योंकि यह ज़िंदगी की उस कशमकश को दर्शाती है, जहाँ इंसान पहले भरोसा करने के लिए खुद को तैयार करना चाहता है।
“नशा आता है हमें इन नज़ारों में, ऐसे सुरूर की हम नकल चाहते हैं”
इस पंक्ति में एक बेहतरीन एहसास झलकता है, जो ज़िंदगी को उसकी संपूर्णता में जीने की चाह को दर्शाता है।
Bahut Khub Mitr
Hum toh yahi chate hein ki aap likhte rahen…
अभी तो फिलहाल मार्च का महीना चल रहा है और हम अपनी बचे हुए सेल्स का आंकड़ा चाहते है ।
वैसे बहुत जबरदस्त परिकल्पना चाहतों की समेटी अपने इस कविता के द्वारा।
क्या ख़ूब कहा…