मौलिक विचारों की पैदाईश भी जन्म के साथ ही हो जाती होगी, ऐसा मेरा मानना है…अब होता है ऐसा कि नहीं ये तो शोध का विषय है।
ये विचार सवाल बन के कौंधा मन में यूं, कि हम सब इतने मुख़्तलिफ़ हुए कैसे? किसी को परबत पसंद है, किसी को सागर किसी को दरिया तो किसी को गागर!
इस सागर और गागर की क़श्मक़श में हमारे मौलिक विचार इस क़दर ज़ब्त होते हैं दिमाग़ी तारों के बीच, कि इनमें बदलाव की गुंजाईश ना के बराबर होती है, उम्र के साथ साथ इनकी लोच सख़्त होने लगती है और दिन-ब-दिन जड़ होती जाती है और इनमें मौलिकता के साथ सिद्धांत जुड़ते जाते हैं जो इसे और जड़ बनाते जाते हैं।
मज़े की बात है ये कि मौलिक विचारों को छोड़, बाक़ी सब विचार शृंखलाओं में लोच बनी रहती है बल्कि मेरा मानना तो यहां तक है कि बढ़ती रहती है…यही द्वन्दता मानवीय व्यवहारों को कटुता और सुंदरता दोनों प्रदान करती है…शायद!!!
अजीब विडंबना है ये मानवीय जीवन की…कभी कभी एकांत में बैठ सोच कर देखा, उम्र के गुज़रते गुज़रते, आपस की बातचीत में जब कभी उन मौलिक विचारों पर बात होती है तो देखा गया है कि वो बातें बहस में बदलती जाती हैं और नाहक ही इक अलग मोड़ ले लेती हैं…बड़े बुज़ुर्गों को ये कहते सुना है कि ऐसी बहसों से दूर रहना चाहिये।
पर मन का क्या करें जो इस ग़ुबार को निकाले बग़ैर चैन नहीं पाता और ग़ुबार निकलने के बाद और बेचैन होता जाता है और फिर और ग़ुबार निकालना चाहता है…ये तारतम्य ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनता जाता है और हमें पता भी नहीं चल पाता है कि ये कैसे हमें अंदर तक बौखला जाता है …ज़िद का रूप अख़्तियार कर लेता है…
ग़र है ऐसा तो मौलिक विचारों पर वार्तालाप का सिलसिला हो कैसे? और जो ना हो पाये ऐसा तो उस उमड़ घुमड़ का क्या जो बवण्डर बना रहे हैं अंदर ही अंदर…और मन पिसा जा रहा घुन जैसा, जैसे कि इसे ऐतबार ही नहीं किसी पे…
शायद इसीलिये हमारे यहां जन्मोजन्मांतर का सिलसिला रहता है खुला, क्योंकि संतुष्ट और तृप्त हो जाना इक ही जीवन में, ऐसा लगभग असंभव है…
पहली नज़र में जिन शख़्सियतों से हम मुत्तासिर हो जाते हैं, उनकी समझ और पकड़ से, उन विषयों पर जिनके वो ज्ञाता हैं। अलहदा इनके उन विषयों से अक़्सर ही मायूस होना पड़ जाता है जब उनके मौलिक विचारों से साख़्ता पड़ता है…बड़ा दर्द होता है और भरा दिल ये सोचता है, यही वो फ़लाँ हैं जिन्होंने मुत्तासिर किया था हमें।
चलिये ये सब भी छोड़ देते हैं इससे क्या ही लेना देना किसी का, ये सब नितांत ख़ुद के विचार हो सकते हैं जिन्हें हर्फ़ों में पिरो कर परोस रहे हैं…विचाराधीन बात तो ये है बस, कि हम चित्त को शांत करें कैसे? क्या कभी ये शांत हो भी सकता है या बस भटकता ही रहता है…आप भी सोचिये हम भी आत्ममंथन करते हैं फिर मिलते हैं कुछ अंतराल के बाद!!!
हां इक बात और…ईधर मेरा घोंघा मेरा मन कचोट रहा है मुझे अंदर से झँझोड़ रहा है कि यही सारी बातें जब मैं करता हूं तो घोंघा कहलाता हूं, मेरे पास जवाब नहीं है उसे देने के लिये, ग़र आप के पास हो तो सुझाइये हमें भी…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
संतुष्ट और तृप्त हो जाना इक ही जीवन में, ऐसा लगभग असंभव है l
क्या उम्दा वर्णन किया है जिंदगी के कश्मकश का ।
बहुत मजा आया पढ़कर । साधुवाद ।
अति उत्तम
अति उत्तम!
आपके विचारों का संक्षेप इस प्रकार है:
1. मौलिक विचार शायद जन्म से ही होते हैं, पर जीवन के अनुभव उन्हें या तो विकसित करते हैं या जड़ बना देते हैं।
2. उम्र के साथ ये विचार कठोर हो जाते हैं, और उनमें लचीलापन कम हो जाता है।
3. जब इन पर चर्चा होती है तो अक्सर बहस बन जाती है, क्योंकि ये हमारी पहचान से जुड़ जाते हैं।
4. बाकी विचारों में लचीलापन बना रहता है — जिससे इंसानी व्यवहार में सुंदरता और संघर्ष दोनों आते हैं।
5. लोग जो मौन रहकर सोचते हैं, उन्हें “घोंघा” कहा जाता है, पर असल में वही सबसे गहराई से जीते हैं।
6. मन को शांत करना कठिन है, लेकिन लिखना, आत्ममंथन और स्वीकार करना इसके रास्ते हो सकते हैं।
निष्कर्ष:
घोंघा कहे जाने से न डरें — भीतर का सोचता मन ही सच्ची चेतना है।
चित्त का भटकना स्वाभाविक है, पर उसे समझना ही शांति की शुरुआत है।