ज़िंदगी की सरजमीं पर...
खेल डर का!!!
खेल डर का!!!

खेल डर का!!!

डरो के डरने का मौसम है…हरदम ये तौलते रहो कि किसमें कितना दम है…

कोख में थे तो माँ डरी हुई थी, ठीक ठाक तंदुरुस्त बाहर आऊंगा कि नहीं…मैं भी डर गया माँ के डर को महसूस कर और यहीं से सिलसिला-ए-डर शुरू हुआ और अभीतक उसी डर का सफ़र है जारी…

विद्यालय जाने की शुरुआत हुई और हमारी तो शामत ही आ गई,हमें गणित समझनी थी, तबतक तो फिर भी ठीक था जब तक अंकगणित सीखनी थी मगर आगे चलकर उसमें बीजगणित और त्रिकोणमितीय भी जुड़ गई और मुझे जूड़ी चढ़ गई…क+ख का होगा क्या? ये जुड़ते ही कैसे हैं? इन्हें क्योंकर ही जोड़ना पड़ता है?
यक़ीन जानिये आजतक समझ नहीं पाये हैं हम।

समय बदला और हम हिंदी माध्यम से इकदम से अंग्रेज़ी माध्यम में चले गये उच्च शिक्षा प्राप्त करने…राजनीति की कक्षा में सवाल उठा ‘साइनो इंडिया’ के रिश्तों के बारे में और मन में उठा बवाल हमारे के कोई हमसे पूछ ना ले इस विषय में…बहुत वक़्त गुज़रने पर जान पाये के चीन है…हालांकि डर बरक़रार रहा, मगर उम्र थी हमारे साथ तो ये सब खेल लगता रहा और हमने सीख लिया इसे झेलना।

कुछ क़ैफ़ियतें होती ही हैं जिन्हें बंधनों में रहने से ग़ुरेज़ होता है, हम उसी क़ैफ़ियत के हैं…ज़िंदगी का सबसे बड़ा डर सामने आ गया …नौकरी और वो भी निजी कंपनी की। अजी क्या ही बयां करें और कितना ही बयां करें, दो चार पोथे तो भर ही जायेंगे जो सुनाने बैठे डर और जीविका जुटाने की अनहोनी कहानी…यूं इक दो किस्सों में दोनों के बीच सामंजस्य और अंतर्द्वंद्व को उजागर करने का प्रयास प्रेषित है…

डर इक खेल है जो पुरज़ोर और कमज़ोर के बीच सदियों से खेला जा रहा, मसलन मेरे हाथ में चाबी है तुम्हारी नियति की, इसलिये मैं बताऊंगा कि तुम अपना भविष्य बनाओगे कैसे? दूसरी ओर कमज़ोर सोचता है कि आज दबा लो हमें पर जिस दिन भी हमारा दिन आयेगा, दिन में तारे ना दिखा दिये तो कहना(मन ही मन करता है वो मनन) और मनःस्थिति व व्यवहारिकता के बीच का द्वंद चलता रहता है लगातार ताउम्र।

मुनाफ़ा चाहिये हर निजी कंपनी को या यूं कहें हर उस इकाई को जिसको कुछ सामान बेच कर कंपनी चलानी है वरना खर्चा चलेगा कैसे…इसी पृष्ठभूमि पर आधारित है हमारा वृतांत।

पूछा लाला ने हमसे क्या काम करते हैं आप कंपनी में, हम जितना आदरभाव ला सकते थे ला कर कहा कि अमुक काम देखता हूं मैं, तुरंत ही जवाब जड़ दिया उसने मुंह पे हमारे कि वो अमुक कार्य जो तुम देखते हो, हमने बंद कर दिया छह महीने पहले, हमारा डर सर पर चढ़ गया और हम ये सोचते हुए वहां से चल दिये कि या तो ये अहमक़ है कि बंद होने के बावजूद भी मैं वही काम करता जा रहा हूं या ये जान कर ये बंद कर देगा अब…जब ये सच्चाई आपके सामने खड़ी होती है आ कर, तो आप सोचने लगते हैं तुरंत, कि पास ही है अंत। ऐसा ही हुआ, उसने अचानक ही बंद कर दिया वो विभाग जिसको मैं हांक रहा था कुछ वक़्त से …और डर का खेल रहा जारी। ये तो भला हो हमारी क़िस्मत का कि उसने आभास करा दिया था हमें और हम ये सब होने से पहले ही लाला को नमस्ते कर चुके थे। हालांकि लाला ये काम अपनी तुफ़ैल में कर रहा ना कि मुनाफ़ा थी उसकी वजह।

विदेशी लाला कंपनियों में भी हालात तक़रीबन ऐसे ही हैं क्योंकि चाहिये मुनाफ़ा, याद है ना! ऐसे ही इक विदेशी लाला ने कहा मुझसे इक दिन कि जानते हो मैं तनख़्वाह के अलहदा, प्रोत्साहन राशि(Incentive money) क्यों देता हूं अपने कर्मचारियों को, क्योंकि मैं उन्हें पैसे से भ्रष्ट कर देना चाहता हूं, जिससे कि वो कहीं और काम ही ना कर सके। उसने तनख़्वाह के सिवा इतनी ज़्यादा प्रोत्साहन राशि चिपकाना शुरू कर दिया कि कर्मचारी अब उसके सामने मिमियाने लगा। उसने हर कर्मचारी को पैसे की हवस से भरना शुरू कर दिया और अफ़ीम की तरह पैसे का नशा सर चढ़ाने शुरू कर दिया, साथ ही साथ ऐसी अपंगता का शिकार बना दिया कि डर को उसने स्वतः ही स्वीकार कर लिया।

ऐसी ही इक दफ़े वो मेरे दफ़्तर में आ कर मेरे समूह को संबोधित कर रहा था, संबोधन पश्चात वो मेरे कमरे में आ कर बोला कि जानते हो तुम्हारे अंदर शक्ति है कि तुम इनको बरख़्वास्त कर सकते हो किसी भी समय, और तुमको गाहेबगाहे निकालते रहना चाहिये कोई भी कारण बना कर, मैं मूक दर्शक की तरह उसको देखता रह गया और वो चला गया वहां से। ज़रा सोचिये कि जिसको जीविका की ज़रूरत हो उसके लिये कितना बड़ा डर है ये।

मेरी क़िताब में ये कंपनियां हैं आजकल के शहंशाह, बादशाह, राजा व सम्राट हैं, जिनकी बपौती है आपके भवितव्य को बनाने बिगाड़ने में और डर का व्यापार बढ़ाते रहने में।

और इस तरह ख़त्म करते है ये तिनका तिनका आपकी विवेचना, विवेकता, मौलिकता, स्वतंत्रता और निर्भीकता और बढ़ाते हैं आपका डर।

अरे भई आप डर रहे हो कि नहीं! आख़िर है तो डर का मौसम ही।

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

One comment

  1. Y Choyal

    मुझे डर है कि जो कल कवि था, जो आज़ लघुकथाएं लिखने लगा है, वो कहीं व्याकरणाचार्य ना बन जाए।
    अगर ऐसा होता है तो डर है कि पढ़ते पढ़ते कहीं हमारे “माथे में टीस”(Mathematics) ना हो जाए।

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