बचपन में आ गये, धूप सेंकने का मज़ा, किसी बात की नहीं फ़िक्र, ना कोई ज्ञान ठेलती बातें ना ही कल का कोई ज़िक्र…ये हम कहां आ गये!
व्याकुलता मस्तिष्क की चौखट पर खड़ी दस्तक देते जा रही थी,
ज़िंदगी किसी भी किनारे को नहीं पा रही थी…अब उसे लगाने किनारे का सिलसिला हुआ है शुरू, वाह वाह रे गुरु…
ख़ुद को विस्मृत करते हुए ख़ुद को विस्तृत करते हुए, ख़ुद से बतियाते हुए, ख़ुद से इतराते हुए, असीमित ज्ञान को असीमित अज्ञान में बदलने की प्रक्रिया का आग़ाज़, हर चीज़ का संज्ञान लेने की विवशता का करके सर्वनाश…ये हम कहां आ गये!
अंदाज़ तो लग रहा था ज़रा ज़रा कि बचपन में जाने का क्या ही मज़ा, और जो अब पार करने की ठानी वैतरणी, तृषाग्नि को दे कर अग्नि, अपने अंदर की उम्रदराज़ ज़्वलन को कर बुझा फिर मासूम बचपने को जिला, ख़ुद से कर आलिंगन नहीं कोई सज़ा, ख़ुद को बना के दीवाना दिखा, ज़माने को ख़ुद का होते देख, वापस जा उस मोड़ पे, जहां तू आया ख़ुद को छोड़ के, जहां ना था कोई ग़म, जहां ख़ुशियां ओढ़ के हम सब थे भूल जाते और पूछते थे सबसे…ये हम कहां आ गये!
बन ख़ुद से बेवक़ूफ़, रख थोड़ा धोखे में समझ से भी क्या लिया सुलझा तुमने, अक़्ल कह रही हमसे, इस्तेमाल कम किया कर अब से…जो है सरल वही है तरल, बहता दरिया बन देख, ठहरे पानी में कहां ऐसा वेग, दूर निकल जा तू ख़ुद से, ढूंढ़ ला जो तू था बचपन में!!! ना सही खुले मैदान में पर खेल गेंदताड़ी मन के प्रांगण में, छुप्पम छुपाई की बारी है आई, आंखमिचौली संग हमजोली और रख पांव भविष्य के आंगन में, भूल कर भूल से, इकबार सान हाथ अपने धूल से…और याद दिला ख़ुद को…ये हम कहां आ गये!
ज़िंदगी ना मिलेगी दुबारा, ये घर आंगन औ चौबारा, फक्कड़ हो, ना अख्खड़ हो, अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, खो खो जा के खो, मत ढूंढ़ ख़ुद को, मत फूंक ख़ुद को, ये जो मिली है क़िस्मत से उसे रख सर माथे, मत लगा दिमाग़ के क्या है आगे…जो है वो आ ही जाएगा सामने…क्योंकर निकालने हैं बेवजह के मायने, अब जब पहुंच गये हैं द्वारे लड़खड़ाते, छत पर टहलना है कोई मतलब ना बनाते और करना है ख़ुद को भौचक्का कि…ये हम कहां आ गये!
जो समझ इकट्ठा की है इतने बरसों में उससे ज़्यादे नासमझी नहीं की है, सबसे ग़ज़ब तो ये हुआ समझ पैदा होते ही कि कहां रखें इसे, इसकी नौबत तुरंत आ गयी और लगा कि अपनी समझ साझा करनी है इन सब के बीच, ये भूल गये कि जिनसे साझा करनी है उनके पास भी तो इकट्ठा हो गयी है इतने सालों में, वो ख़ुद ढूंढ़ रहें हैं जिन पर उड़ेल सकें जो वो समझ चुके हैं, यानि कि बेवजह की तक़रार…और हम जैसे चार समझदारों ने मिलकर दुनिया की ये हालत कर दी है…अब तो तकनीक के ज़ोर पे समझ साझा करने के लिए साथ मिलना भी ज़रूरी नहीं है…अब आगे जाना है पीछे, कल आज औ कल के गोलार्ध में और फिर से करनी है शुरुआत जिस समझ की आहुति दे रहें आज…वक़्त मिला है जो बीच में वो बितायेंगे अपने साथ अपनों से बांट…
“मनुशरद”
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Kya baat hai dada anchor in storm