ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बरसों में!!!
बरसों में!!!

बरसों में!!!

बरसों में ही सही कभी कभी उभरती है,
ख़ुश हूँ के टीस उन्हें भी उतनी रहती है,

मालूम है रंज ओ ग़म की वक़त उन्हें भी,
ये जान के  रंज ओ राहत बनी रहती है,

वो क़शिश ही क्या जिसमें ख़लिश ना हो,
फांस दिल की ये दोनों ओर चुभी रहती है,

मुस्कुराते, फिर दिखाते कि भूल जाते हैं,
फिर भी खरोंचों के निशां दिखाती रहती है,

दिल के दाग़ों को मिटाना चाहते नहीं हैं,
और उनकी यादें भी यादें बनाये रहती हैं,

वजूद में रँग भरने में मशगूल कुछ यूँ रहे,
साथ हो कर भी कैसी दूरी बनाये रहती है,

रंजिश ही निभा लेते, मुलाकात जो होती,
मुहब्बत के पन्नों पर स्याही पुती रहती है,
          
          (बनावटी)
जानते हैं मसनू’ई नहीं हमारी मुहब्बत,
फिर क्यों जज़्बों को छेड़ती रहती है,

ज़िन्दादिल दिल्लगी है उनकी पहचान,
तीखी मुस्कान चेहरे पे बनाये रहती है,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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