ज़िंदगी की सरजमीं पर...
तल्ख़!!!
तल्ख़!!!

तल्ख़!!!

ख़बर है ये, कि ये ख़बर है ख़ास,
वक़्त हो बुरा, क्या कीजिये जनाब,
कैसे चले पता कि वक़्त है ख़राब,
वक़्त के तो होते नहीं कोई जज़्बात,

वक़्त को मायने देता है कौन भला,
दो टूक की ज़ुबां का क्या ही कहना,
ज़ुबां पे जब कभी चढ़ जाते हैं कटाक्ष,
ज़ुबां भी भूल जाती है अपनी औक़ात,

कम है कुछ, तो बस वक़्त है कम,
पर गुज़रते गुज़रते निकलता है दम,
सांस भरने उखड़ने की है शुरुआत,
हां तीखी ज़ुबां की बिछाते हैं बिसात,

हर दौर की कहानी में यही अल्फ़ाज़,
हर दौर ने रखी तल्ख़ की नयी बुनियाद,
पर असर में इनका है इक ही अंदाज़,
चुभा चुभा के ये लफ़्ज़, करे लहूलुहान,

इनके बिना कितना बेबस है इंसान,
के जता जता के ठहराता है बेईमान,
ना होती ईजाद तल्खियां अगर,
यक़ीनन ही इंसान रह जाता जानवर,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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