ये साये हैं परछाइयों के,
ये पाये(पैर) हैं गहराइयों के,
बड़ी देर से ढूढ़ें उचाईयों को,
यहां साये कतराते हैं रुसवाइयों से …
ये साये हैं…..
ये रास्ते हैं कठनाइयों के,
ये शोले जलते हैं चिंगारियों से,
राह पाई पार कर दुश्वारियों को,
यहां चुन के आते हैं कठनाइयों से…
ये साये हैं…..
ये रहनुमा हैं रानाइयों के,
ये खेलते हैं परेशानियों से,
इनसे मुहब्बत है हमसायों को,
यहां रहनुमा बनाते हैं ख़ुदाइयों से…
ये साये हैं…..
ये खेले हैं स्याहियों के,
ये रेले हैं हरजाइयों के,
साये समझे ये रौशनियों को,
यहां खेल खिलाते हैं दुनियादारियों के…
ये साये हैं…..
ये अश्क़ हैं बेज़ारियों के,
इन्हें रश्क़ हैं बेकारियों से,
शौक़ से रेते हैं पेरशानियों को,
यहां लहू बहाते हैं जिम्मेदारियों के…
ये साये हैं…..
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Bahut khub