ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नज़रों का इल्म!!!
नज़रों का इल्म!!!

नज़रों का इल्म!!!

कभी कभी अपने पर यकीं करने में,
जाने क्यों किसी का दख़ल चाहते हैं,

मेहनत से बनाई हुई इस ज़िंदगी में,
किसी की तौसीक़ क्योंकर चाहते हैं,
(Validation)

मौला को छोड़, क्या मांगे किसी से,
इस इल्म की दुआ हर पहर चाहते हैं,

के हमें बनाना है इक ऐसा जहाँ,
हर बाशिंदे की उसमें गुज़र चाहते हैं,

उनसे है शिक़वा, मरहम भी उनसे,
कह नहीं सकते, किसक़दर चाहते हैं,

क़मज़र्फ सोच की तमन्नाएं देखिये,
हर इक पर अपना असर चाहते हैं,

बिन ज़िम्मे की तमन्नाओं की ख़्वाहिश,
सीढ़ी चढ़े बग़ैर छत का सफ़र चाहते हैं,

बारिश की चढ़ती जवानी देख कर,
उसी से होना हम तरबतर चाहते हैं,

बेबाक़ दिल कह सके अपने मन की,
बेख़ौफ़ अदा को मुसलसल चाहते हैं,

दुनियादारी की समझ पनपे या नहीं,
सादादिली की ख़ुद पर नज़र चाहते हैं,

क़ैद कर रखी हैं क़ैफ़ियतें कुछ यूंभी,
ख़ुदग़र्ज़ तहों को तितरबितर चाहते हैं,

मुहब्बत से चलती आयी है ये दुनिया,
मुहब्बत को “मनु” हर दर चाहते हैं,

नज़रों का इल्म जबसे जागा है हममें,
क़यामत की नज़रों में उतर चाहते हैं,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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