दो जून की रोटी!!!
ख़ुद पे ना गुज़रे, मुश्क़िल है समझ पाना,हैं हज़ारों जिन्हें मयस्सर नहीं इक दो दाना, नहीं हासिल, जिसे अच्छा कहे ज़माना,है मुफ़लिसी वो दाग़, मुश्क़िल …
ख़ुद पे ना गुज़रे, मुश्क़िल है समझ पाना,हैं हज़ारों जिन्हें मयस्सर नहीं इक दो दाना, नहीं हासिल, जिसे अच्छा कहे ज़माना,है मुफ़लिसी वो दाग़, मुश्क़िल …
मौलिक विचारों की पैदाईश भी जन्म के साथ ही हो जाती होगी, ऐसा मेरा मानना है…अब होता है ऐसा कि नहीं ये तो शोध का …
उसने कहा अपने घर आ कर,कि मैं अपने घर से आ रही हूं,मुझे दो पल लेने दो सुकूं ज़रा,बेहद थकी हूं, टूट के आ रही …
कल शाम, कल रात से बात हुई,सोचती रही रात मगर नहीं सोयी,वक़्त था तक़रीबन रात के ढाई,अल्लाह दुहाई अल्लाह दुहाई,नींद आ कर भी नहीं आई,सख़्त …
कितने ही सच, झूठे देखे,बिखरे बिखरे से टूटे देखे,किसी को क्या पता था,किसी ने ख़्वाब सुनहरे देखे… कुछ सच्चे लोग, झूठे देखे,फ़रेबी नहीं थे, फ़रेब …
लग रहा था ऐसा,जा रहा था जला,अंदर ही अंदर… कुछ था भी ऐसा,कि पता ना चला,उबल रहा बवंडर… मनजला मनचला,दिल को गया बना,खंडहर ही खंडहर… …
ऊपरवाला हम सब का इक है,लेकिन हमारा सबमें सर्वश्रेष्ठ है, कैसी विडंबना ये कैसा उत्तेज है,ज़रा सी बात बवंडर बना तेज़ है, सबका तरीक़ा मुख़्तलिफ़ …
ख़्वाबों को ज़रा सजा कर रखिये,बेतरतीब ख़्वाबों से उलझने है बड़ी, दीवार पे टंगे हैं कई ख़्वाब, मगर,ताबीर में उनके, अड़चने हैं खड़ी, जाल बुनती …
आसमां से गहरी समंदर से ऊंची,हाय, ये परेशानियां हैं कैसी कैसी, कहीं सुलझी हुई कहीं मसनुई सी,सीधी उलझी सुबहें अच्छी लगती, उसने कहा ज़मीं तौल …
त्रैता युग ने,रामायण रचाई,और द्वापर में,महाभारत रच आई,आदमी को आदमी की,सुध शायद ना आई… कलयुग ही है ऐसा,जिसमें बोलता पैसा,पैसा खेल अनोखा,पैसे ने है सिखाया,ये …