नंदिनी : कुर्ग का ज़िक्र!!! भाग ५
दक्खन के चबूतरे कूर्ग में परिवार था बसा,उत्तर के काशीपुर शहर का था रहनेवाला,मां पिता इक बेटी इक बेटे का संसार उनका,जंगल संरक्षण विभाग में …
दक्खन के चबूतरे कूर्ग में परिवार था बसा,उत्तर के काशीपुर शहर का था रहनेवाला,मां पिता इक बेटी इक बेटे का संसार उनका,जंगल संरक्षण विभाग में …
प्रणय को लगता था कि ज़िंदगी,हर वक़्त गुलज़ार होने को हुई,पढ़ाई में उसका मन लगता था कम,कभी कभी वो घूमने निकलता इकदम,साथ दोस्तों के ख़ुद …
प्रणय की शिक्षा शुरू हुई बनबसा से,आगे की पढ़ाई की उसने नैनीताल से,बारहवीं की थी बिड़ला विद्या मंदिर से,कला की पढ़ाई कुमाऊं विश्वविद्यालय से,उसको पहाड़ …
समग्र चरित्र निवासिनी,तन मन से सुंदर नंदिनी,स्वयं में वो परिपूर्ण थी,इच्छायें उसकी बढ़ रही,जवानी उसपर चढ़ रही,ज़िंदगी से भरपूर वो थी,मां पिता के बीच संबंधों …
बेरीनाग की सुंदर अनारकली,अल्मोड़ा में थी वो पली बढ़ी,बचपन से थी अत्यंत चुलबुली,पैर ना टिकते थे एक भी घड़ी,उछल कूद मौज मस्ती थी बड़ी,उसको प्यारा …
नंदिनी की रचना में सबसे बड़ा आभार कुमाऊं गढ़वाल का है, जिस भूमि के प्रति मेरा अलग ही अनुराग है… मेरे जीवनसाथी के योगदान का …
पहाड़ों के प्रति मेरा लगाव वहां जल्द पहुंचने की व्याकुलता,और मेरे अनगिनत तजुर्बों में बसा कुमाऊं, गढ़वाल… शायद यहीं से नींव पड़ी “नंदिनी” के बारे …
सिलसिला बस यूंही चलता रहे मांगा ईश्वर से मैंने,बाहर पहुंच के ये बात शायद समझ में आई उनके,क्या कहें कि थामे हुए हैं हाथ मेरा …
यूं जाने का मन तो था नहीं, पर था भी वहां से,कभी कभी कुछ अनुभूतियों को स्वीकारने में,ख़ुद के साथ वक़्त चाहिये उसे जज़्ब करने …
अगले दिन पहुंच गई मैं जल्दी, उनके आने से,पर मैं ये भूल गई थी कि जाना है पहले पढ़ने,उनसे तो मिलेगें अब हम सारा दिन …