दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ४
देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,इसलिये बेधड़क हुई …
देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,इसलिये बेधड़क हुई …
इन्ही ख़यालों के बीच पहुंची घर अपने,और सारी रात निकली बुनते हुए सपने,हक़ीक़त से परे थे वो सपने जिन्हें मैंने,अन्जाने चुन लिया था अपनी ज़िंदगी …
जबसे उसको अपना माना मैंने,इंतेज़ार बड़ी सज़ा है, ये जाना मैंने,इंतेहा तो तब हुई, नाम ना जाना मैंने,कैसा अनुभव, जिसे जीना जाना मैंने,और ये भी …
दरख़्त के पास वाली दुकान से,कुछ ख़रीद रहा था जब पहुंची मैं,देखा भी ना था मैंने उसे ग़ौर से,और क्यों ही देखूं किसी को मैं?जब …
दिलपे था उसके ज़ोर, इक इल्ज़ाम दिया था उसे,उसी ने दिया ज़ख़्म जिसने मलहम दिया था उसे, इल्ज़ाम को थामे थामे, वो बिताता रहा ज़िंदगी,जो …
स्याह के कई छाया रंग बिखरे हुए हैं, हर इक छाया की अपनी अलग दुनिया है…जहां से जहां तक देख पा रहा हूं वहां पर …
वो सिमट जाना चाहती थी, उस वक़्त के क़रीब जाना चाहती थी, जहां उसने देखा था खुला आसमां और बैठी थी वो इक दरख़्त तले …
किसी ने कहा : “मिट्टी में मिलने से पहले मिट्टी से मिल तो लें” और यूं शुरू हुआ ज़िंदगी का वो सफ़र जिसने घोंघे को …
डरो के डरने का मौसम है…हरदम ये तौलते रहो कि किसमें कितना दम है… कोख में थे तो माँ डरी हुई थी, ठीक ठाक तंदुरुस्त …
जो ग़ुबार बन रहे थे कहीं,जो गर्द बन उड़ रहे थे कहींजो नहीं संभल रहे थे कहीं,दश्त में ख़्वाब बोये थे कभी, इनायत उनकी कुछ …