माथे पर, सिफ़र ठहरा,
चांदबाली सा लहरा रहा,
बढ़कर रुख़सार चूमता,
हो सुर्ख़, कभी दमकता,
सिफ़र से सफ़र शुरू हुआ,
सिफ़र से बने है कहकशां,
सिफ़र से कम, चश्म जमा,
ऊपर हुआ ज़रा, चश्म बहा,
जबसे सिफ़र है माथे मढ़ा,
माथे पे लगने लगा है बड़ा,
जैसे सूरज हो उगता हुआ,
सुबह को माथे धरता हुआ,
शिकन पेशानी की छुपाता,
सिफ़र कभी कभी बताता,
सिफ़र की इक है दास्तां,
उसे छोर नज़र नहीं आता,
इसी में झूमते माता पिता,
इसी में भाई बंधु व सखा,
इसी में सभी को है झूमना,
अंत उद्गम को यहीं घूमना
सिफ़र से सिफ़र के सफ़र में,
सफ़र है सभी का बंधा हुआ,
इस का ना कोई छोर है, ना,
…ही है कोई इसकी व्याख्या,
शून्य है, सब शून्य में है बसा,
ना तरंगित, ना बाद ए सबा,
ना कोई आवाज़ है ना जुबां,
ढूंढ़ते सब अपने अपने ख़ुदा,
सिफ़र, मनु को है आज़माना,
नहीं है मुमकिन ये जान पाना,
कहां से आये कहां है जाना,
है इक सराय, ज़रा ठौर पाना,
मुसाफ़िर मगर ना जाने ठिकाना…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava