ज़िंदगी की सरजमीं पर...
अख़बार!!!
अख़बार!!!

अख़बार!!!

रोज़ अख़बार पढ़ कर सोचता हूं,
आख़िर क्यों मैं अख़बार पढ़ता हूं,

बचपन से वही ख़बर पढ़ता रहा हूं,
सोचता हूं कि मैं क्या पढ़ रहा हूं ,

दो चार आने इधर उधर होते हैं,
बाक़ी बस बासी ख़बर पढ़ता हूं,

मानसिक तरक्क़ी रुकी हुई है,
बिना दिमाग लगाये पढ़ता हूं,

ऐसा लगे जैसे मेरा कर्तव्य है,
ना जानूं तो सज़ा का हक़दार हूं,

पढ़ते पढ़ते अब तो लगता है,
कि मैं ख़ुद ही इक अख़बार हूं,

किसी विषय पे कहीं बात हो,
बीच के पन्नों के तरह राय देता हूं,

ज़्यादे मज़ा तो संस्करण में है,
पढ़ने के सिवा सबकुछ देखता हूं,

आज अख़बार मुझसे पूछता है,
कि मैं अख़बार में क्या पढ़ता हूं,

बस वो मुझे मुझसे मिलाता है,
वरना पढ़ने से कब का उठ चुका हूं,

जानना चाहते हैं तो बताता हूं,
अख़बार के ज़रिये वक़्त काटता हूं,

ना हो अख़बार तो कहेंगे सब,
काम नहीं है तो उन्हें चाटता हूं,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

One comment

  1. Pradeep Srivastava

    बहुत अच्छा लिखा है। लोग अखबार पढ़ते और चाय पीते सिर्फ वक्त काटने के लिए।

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