ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सभ्यता है भी पुरानी???
सभ्यता है भी पुरानी???

सभ्यता है भी पुरानी???

यहां आदम के मिले हैं अंडे,
यहां आदम अंडे से  निकले,
यहां के बहुत बड़े बड़े फंडे,
ना छुट्टी ही मनाई ना  संडे,

ये सिलसिले चले सदियों तक,
फिर आदम यहां का गया थक,
ये आदम किसी काम का नहीं,
ना इतिहास यहां, ना मिथक ही,

यहां सब है अजीब ओ ग़रीब
पौराणिक यहां कुछ भी नहीं,
मध्य एशिया से आई संजीवनी,
अंगरेज़ों ने सिखाई नई ज़िंदगी,
सभ्य बने वो, जो सभ्य थे नहीं,

जो पढ़ लिख गये वो महारथी,
वो बताते हैं जीने की नई विधि,
वो जताते हैं उनकी है नई सदी
अभी हुए ही थे हम स्वतंत्र सभी…

पढ़े लिखे दिखाएं ग़र समझदारी,
जिसे समझते जनता की लाचारी,
निरी मूर्ख रह गयी ये जनता भी,
मिल के जनता ने सत्ता बदल दी…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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