ज़िंदगी की सरजमीं पर...
जीवनलीला!!!
जीवनलीला!!!

जीवनलीला!!!

लग रहा था ऐसा,
जा रहा था जला,
अंदर ही अंदर…

कुछ था भी ऐसा,
कि पता ना चला,
उबल रहा बवंडर…

मनजला मनचला,
दिल को गया बना,
खंडहर ही खंडहर…

पास हो के भी हां,
अपनी ही रूह का,
ना पता ना ख़बर…

लगा कि मैं प्यासा,
उसे भी ऐसा लगा,
सूखा हुआ समंदर…

आंखों में ना निंदिया,
पर जिस्म सोता रहा,
उठा इक लाश बनकर…

भू भू कर जलने लगा,
जिस्म का रोयां रोयां,
स्वाहा स्वाहा का स्वर…

जिस्म जब भस्म हुआ,
मोह फिर भंग हुआ,
देख, हंसा, ठठाकर…

अब नहीं कोई चिंता,
शांत हो चुकी चिता,
उठा भभूत बनकर…

क्यों सोच कर रोया,
क्या पाया जो खोया,
अंत हुआ यहीं पर…

जल जो कल होगा,
फिर वो पल होगा,
वक़्त को लाँघकर…

वो भू से जन्मेगा,
वो भू का होगा,
भू में ही बो कर…

ना मेरा ना तुम्हारा,
बस ये पल है सारा,
रहेगा ये भी पलभर…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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