ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सच झूठ!!!
सच झूठ!!!

सच झूठ!!!

कितने ही सच, झूठे देखे,
बिखरे बिखरे से टूटे देखे,
किसी को क्या पता था,
किसी ने ख़्वाब सुनहरे देखे…

कुछ सच्चे लोग, झूठे देखे,
फ़रेबी नहीं थे, फ़रेब देखे,
परत दर परत खुलती गयी,
होश में ही होश उड़ते देखे…

हर बात पे शक़ करते देखे,
हर नज़र पे नज़र रखते देखे,
कमज़र्फ़ सोच के जलवों में,
ख़ुद को मौला समझते देखे…

बचपन से सीख देते देखे,
और बड़े बड़े दधीच देखे,
उसूलों में माने जाते अव्वल,
मौके पर उसूल बदलते देखे…

सीख देने वाले शिक्षक देखे,
भीख लेने वाले भिक्षुक देखे,
धर्म की विवेचना करने वाले,
अपने ही धर्म से भटकते देखे…

कुछ शख़्स किसी को तकते,
कही बात उसकी सर पे धरते,
आलाकमानी पसन्द है जिन्हें,
वो काला पानी से बनते देखे…

क्या हुआ पता चला नहीं ये,
क्यों ख़फ़ा थे जाने कोई कैसे,
ज़ुबां से वो जो कुछ कह गये,
वो तीर ज़हन में धंसते देखे…

अब ख़ूनम खूं हैं सीने उनके,
जो सीने से भी नहीं रूक रहे,
लहू बहा जाता है आंखों से,
घाव वो होते बहुत गहरे देखे…

कितने ही झूठ, सुनहरे देखे,
नक़ाब में छुपे हुए चेहरे देखे,
अस्ल खुल के आया सामने,
वो चेहरे, मोहरे बनते देखे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

3 Comments

  1. Kranti

    ।।उसूलों में माने जाने वाले अव्वल, मौके पर उसूल बदलते देखें।।

    बहुत से सच है झूठ देखें… लाजवाब शानदार….

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