ज़िंदगी की सरजमीं पर...
पितृ-सत्तात्मक समाज का अंतर्द्वंद!!!
पितृ-सत्तात्मक समाज का अंतर्द्वंद!!!

पितृ-सत्तात्मक समाज का अंतर्द्वंद!!!

उसने कहा अपने घर आ कर,
कि मैं अपने घर से आ रही हूं,
मुझे दो पल लेने दो सुकूं ज़रा,
बेहद थकी हूं, टूट के आ रही हूं …

घर अपने आ कर उसने देखा,
है कोई और जो है अपने घर में,
वो भी जाना चाहती है घर अपने,
जहां बुने उसने इस घर के सपने…

जब वो आया घर से अपने,
बिताने कुछ पल, घर में मेरे,
मैं जान गयी के ये घर नहीं,
समझा कभी भी अपना उसने…

सदियों से होता आया है,
सदियों तलक क्या रहेगा ऐसे,
कैसे कहूं कि मैं हूं कहां की,
मेरे तो दोनों घर है अपने…

मेरा पराया क्यों समझूं मैं ही,
कुछ भी पराया लगता नहीं मुझे,
तबतक जबतक ना पूछो मुझसे,
कब आओगी तुम अपने घर से…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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