ख़ुद पे ना गुज़रे, मुश्क़िल है समझ पाना,
हैं हज़ारों जिन्हें मयस्सर नहीं इक दो दाना,
नहीं हासिल, जिसे अच्छा कहे ज़माना,
है मुफ़लिसी वो दाग़, मुश्क़िल है धो पाना,
अभी कुछ रोज़ ही गुज़रे थे उनसे मिले हुए,
नहीं रहे, कुछ रोज़ से खाया नहीं था खाना,
किसे फ़ुरसत कैसी मुहब्बत कैसा फ़साना,
सुबह शाम इकठ्ठा करना बस खाने का दाना,
फ़र्क़ है तिनके और तिनकों को बीनने में,
इक में है मुहब्बत इक में पसीना टपकाना,
फ़र्क़ ऐश और मुफ़लिसी में है बस इतना,
इक का फ़साना दूजे का घुट के मर जाना,
क़तरा मिलता नहीं आसानी से ज़मीं का,
फ़ुरसत किसे, दो जून की रोटी है कमाना,
रुतबे जो धूल में खिल के ख़ाक हैं हो रहे,
चौराहों पे रोज़ दिखता है उनका तिलमिलाना,
जिसने देखा हो इन ज़िंदगियों को क़रीब से,
वही समझ सकता है दिल का दहल जाना,
जहां प्यास हो तड़पती और भूखा हो फ़साना,
कहते हैं मनु है मुश्क़िल ऐसे में इंसा रह पाना,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
“बहुत ही उम्दा रचना!”