सैलाब गुज़र रहे ज़ायका क़लियों से,
बुलबुले फूट रहे, फ़रमाने को चंद चीज़ें,
फ़िरनी, गुलाब जामुन या हो रसगुल्ले,
ज़ायक़ा क़लियों की ऐठन हैं मिटा देते,
अबकी दफ़े लगता है कुछ बदलेगा,
मुंह के मौसम में बदलाव आने वाले,
सच कहते हैं तीखी जुबां रखने वाले,
तड़का लगाया जाये ग़ुमांओं में तीखे,
जब दिल है साफ़, ज़ुबां हो मीठी,
ज़ायक़ों की है चाहत ठहरे उसी पे,
आज बनी खीर दूध चावल मेवे की,
जश्न साथ का मनाया ज़ायक़ों ने,
सिवईयों का इतराना तो ज़रा देखिए,
गाहे बगाहे शीरमाल चखना रह रह के,
हर स्वाद चखा ज़ायक़ा क़लियों ने,
उम्दा वो सादादिल करे साफ़गोई से,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava