ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दिवस माँ का!!!
दिवस माँ का!!!

दिवस माँ का!!!

दिवस आज है माँ का, तो कल दिवस था किसका और कल दिवस होगा किसका…और उसके पीछे के पल और आगे आने वाले कल, क्या माँ के दिवस नहीं होंगे? अगर नहीं तो किसके होंगे अगर हाँ तो आज के दिवस का क्या?

ग़र बात है मनाने(celebrate) की माँ को, तो फिर हर रोज़ क्यों ना हो…बंधन ग़र उन्मुक्त ना हों तो सांचे की आवश्यकता पड़ती है, और इससे इक और चीज़ उपजती है…कि सांचे में ढाल कर आसानी होती है क्योंकि अब वो माँ है और माँ के दायित्व के तहत उसकी परिधि है जिसे लांघने में उस नारी को छोड़ सभी को दिक़्क़त होती है…क्यों? क्योंकि सब उसकी ज़िम्मेदारी है, वो भले ही पहले इक नारी है, उसकी नारी के तौर पर ख़ुद के प्रति ज़िम्मेदारी है…मगर सांचे में ढाल कर परिधि में बाँध कर बिन कुछ कहे उसपर भारी ज़िम्मेदारी उठाने की क़ैफ़ियत तारी है…माँ फिर भी मुस्कुरा रही है!

अगर मनाना(celebrate) ही है माँ का दिवस तो आगे बढ़कर, उसका बोझ ख़ुद पे रखकर उसको ख़ुद के साथ समय बिताने की सलाहियत समझ कर और कुछ देर माँ से हटकर…नारी के तौर पर उसकी क्या ख़्वाहिशें हैं उसकी क्या चाहते हैं, और ये कि उसको भी उन्मुक्तता प्यारी है, उसकी ‘कब आने वाली नहीं’ अभी और हर वक़्त उसकी बारी है…माँ से पहले वो नारी है!

जिस पल ये समझ समाज ने अपने अंदर उतारी है, वहीं से हर पल हर क्षण हर दिन माँ को मनाने(celebrate) का है!!! फिर माँ को मनाने का दिन मुक़र्रर करना नहीं है क्योंकि माँ से हम हैं हमसे माँ नहीं है!!!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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