सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है जिसकी अनुभूति मध्यमवर्गीय सामाजिक ढांचे को चुनौती सी लग रही है…शायद।
बीते हुए दशकों में हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ इलाकों में मध्यम वर्ग की संज्ञायें भी भिन्न हो चुकी हैं…मसलन शहरों और क़स्बों का अगर वर्गीयकरण किया जाये तो बहुत बड़े शहर, बड़े शहर, मध्यम शहर, छोटे शहर और क़स्बों में इस वर्ग का वास है और इन सारे वर्गीयकरण में आर्थिक, राजनीतिक, और सामाजिक सूझबूझ का अंतर बहुत बड़ा है और इसे मुख़्तलिफ़ शहरों के वर्गीयकरण में साफ़ साफ़ देखा जा सकता है। स्वतंत्रता के इक़दम बाद और शायद इक दशक तक ऐसा वर्गीयकरण नहीं दिखता था (या कोई माध्यम नहीं था जिसकी वजह से दिखता) और उसकी ढेरों वजहें थीं…रही होंगी…
उसके आगे आने वाले दशकों में समझ की पैमाइशें(आर्थिक और राजनीतिक ख़ास तौर पर) इतनी मुख़्तलिफ़ व मुखरित होती गईं के मध्यम वर्ग में ही उच्चतम, उच्च, मध्यम, निम्न वर्ग में इनको देखा जा सकता है…सोने पे सुहागा यह है कि डिजिटल क्रांति ने जानकारी की उपलब्धतता जन जन तक पहुंचा दी है। हो ये रहा है कि मध्यम वर्ग में ही भिन्न भिन्न विषयों के ले कर परस्पर मतभेद हैं (जो रहे होंगे पहले से भी) और वो तुरंत प्रेषित भी हो जाते हैं डिजिटल माध्यम से देश दुनिया में…इसकी वजह से जो एकीकरण लगता था कि है मध्यम वर्ग में(या हम स्वयं को विश्वास दिला रहे थे), उसकी दरार रेखा उभर कर सतह पर आ गई है और अब मध्यम वर्ग किसी भी श्रेणी का हो वो अपना हक़ जता रहा है सामाजिक, आर्थिक और ख़ासकर राजनीतिक समझ को ले कर। वो अब केवल स्वीकृति में सर हिलाने तक सीमित नहीं समझता है अपने आप को, बल्कि वो बराबर की हिस्सेदारी चाहता है हर इक विषय पर…
वो ख़ुद को जागृत समझता है और होगा भी…परन्तु ये बात तय है कि वो अपने आप को मुखर कर अपनी स्वीकृति की मांग भी कर रहा है…अच्छा है या बुरा ये तो समय ही बताएगा पर अब होगा ऐसा ही और उस वर्ग की दबी कुचली(यानि क़ाफ़ी वक़्त से दबी हुई) चाहतें जो पहले प्रस्फुटित नहीं हो पाती थी वो अब डिजिटल माध्यम से सामने आ रही हैं…माने या ना माने पर मध्यम वर्ग की हर इक श्रेणी और उच्च तथा उच्चतम वर्ग को भी इस सोच से तारतम्य बैठाना ही होगा और जो ये कर लेगा उसका भवितव्य साथ साथ का होगा और जो वर्ग ऐसा नहीं कर पायेगा उसे धीरज रखना पड़ेगा लंबे समय तक…शायद जीवनकाल तक।
सबसे ग़ौरतलब बात जो गहरी विवेचना का विषय हो सकती है वो ये कि मध्यम वर्ग में ही अब कुछ वर्ग(जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है) ऐसा समझने लगे हैं कि मध्यम में ही जो उच्च वर्ग हैं वो अपने आप को मध्यम क्यों मानते हैं…इस विषय का आधार आर्थिक ज़्यादा है बजाय किसी और समीकरण के…और ठीक इसके विपरीत मध्यम में उच्च वर्ग का आधार सामाजिक और राजनैतिक समझ से ज़्यादा है क्योंकि आर्थिक तौर पर वो सुरक्षित महसूस करते हैं। मध्यम वर्ग के भिन्न वर्गों के बीच परस्पर इक अंतर्द्वंद अपनी जगह बनाता दिखता है जहां इक ओर आर्थिक मुद्दा सबसे बड़ा दिखता है और उसे पार करने की जद्दोजहद अपनी सीमाएं लांघती लगती हैं वहीं दूसरी तरफ़( जहां आर्थिक संपन्नता है) बातें सामाजिक व राजनीतिक व सांस्कृतिक विषयों पर फैली ज़्यादा दिखती हैं और आर्थिक पर ज़रा कम…इक अंतर्धारा(under current) इन सभी वर्गों के बीच बहती रहती है वो आरंभ से ही रही होगी किंतु उचित अवसर पा कर अब मुखरित ज़्यादा है और ये अंतर्द्वंद ही मंथन को सार्वभौमिक बना रहा है ना कि किसी इक कोने की विशेषता!!!
व्यापार का इक अनकहा उसूल है कि व्यापार का मतलब वृद्धि…और वृद्धि तभी संभव है जब मुनाफ़ा हो रहा हो…अब इसको मध्यम वर्ग की नव चेतना के संदर्भ में ग़र देखें तो पायेंगे कि अब इसे रोकना संभव नहीं है क्योंकि इसे चाहिये “वृद्धि” और राजनैतिक मुनाफ़ा क्योंकि राजनैतिक मुनाफ़े से जुड़ी है आर्थिक संपन्नता। चाहें तो इसे स्वीकारें और चाहें तो इस नव चेतना को कुंठित मन की व्यथा, वेदना की संज्ञा दे कर छोड़ दें…पर ये नव चेतना और उसपर डिजिटल क्रांति का साथ, ऐसा प्रतीत होता है कि ये अपना रास्ता बना ही लेगी या यूं कहें कि बना ही लिया है!!!
“मनुशरद”
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