क्या ख़ूब सोचकर भेजी ज़िंदा वो तस्वीर,
मुहब्बत की जीती जागती उम्दा वो तस्वीर,
बे इंतेहा तड़प के साथ ये कह रही तस्वीर,
हर सितम पर मुस्कुराती रह रही तस्वीर,
पर्दे से निकल बोल पड़ेगी ये कैसी तस्वीर,
खिंच के चला आये आशिक़ है ऐसी तस्वीर,
तस्वीर के अंदर छुपी बैठी किसकी तक़दीर,
उसने कहा टूट के मिलती ख़्वाबों की ताबीर,
हो कर दीवाना है वो दिखती हर दर तस्वीर,
मुहब्बत मुमकिन करती, तोड़ के हर ज़ंजीर,
नादान बहुत भोली इक इक उनकी तस्वीर,
अभी अभी बोली है आहिस्ते उनकी तस्वीर,
नहीं होना है मुक़म्मल यूं पेश की तजवीज़,
बेचैन तमन्नाओं में होती मीठी सी तक़लीफ़,
कौन मरता किसीके लिये मुहब्बत से पूछा,
क्या कभी देखी नहीं नफ़ासत भरी तस्वीर,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava