ज़िंदगी की सरजमीं पर...
‘जी’ !!!
‘जी’ !!!

‘जी’ !!!

इक दिन कहा उसने अपने आप से…जो हो रहा है सदियों से हम जैसों के साथ रे…अब वाबस्ता हो गया वो सब हमारे ज़हन में जैसे कि कोई रोज़मर्रा की बात है और इतना गहरा उतर गया है कि हम अपने आने वाली पीढ़ी को बिन सोचे ही तैयार करते रहते हैं मन ही मन!

वो चेतना जो जगी नहीं है, कहीं मुँह ओढ़े सो रही है कुंभकर्ण की नींद में…उसे जगाना आसान ना होगा, सदियों की तंद्रा ऐसे ही नहीं तोड़ी जा सकती है…सुप्त जुगुप्सा के जागृत होने से मुमकिन है कि वो माध्यम खुल सके जिससे सदियों की तंद्रा को छिन्न भिन्न किया जा सके…हालांकि है ये अत्यंत कठिन कार्य!

बिटिया का जन्म, बिटिया की परवरिश, उसकी पढ़ाई लिखाई, सब इक तरफ़…और उसका ब्याह और ब्याह के बाद का जीवन दूसरी तरफ़, कि जा अब कर निर्वाह स्वयं अपना और स्वीकार कर स्वामित्व उस घर का जिसमें तुझे है ब्याहा या जहां प्रेम विवाह है रचाया!

आ ही गई वो घड़ी जहां से अब, उस जहां तक इक बिटिया को ऐसा सफ़र तय करना है जिसकी कल्पना उसका मोम सा मन कर ही नहीं पाता(अमूमन तौर पर)…क्या बिटिया को कुछ भी नहीं आता, ये वो सवाल है के जिसपे उसका दिल है तिलमिलाता और नये नये घर में कुछ कहा भी नहीं जाता…

ब्याह के बाद के पहले कुछ दिनों का व्यवहार, अभी अभी बने परिवार का उसके ज़हन पर गहरी छाप छोड़ है जाता और जिसे वो ता-उम्र याद रखती है!

उन्हीं दिनों होता है शुरू माँ/अम्मा/मम्मी के आगे ‘जी’ है लगाना यानि मम्मी बन गईं मम्मीजी, पापा हो गये पापा जी और इसी तरह से सारे रिश्ते नाते अब जी में बदल गये…ये हुआ पहला अध्याय बिटिया को ये बताने का कि तुम बिटिया नहीं हो बस बिटिया जैसी हो…होने और जैसी होने का फ़र्क़ तो समझते ही होंगे आप सब जिनके उत्तरार्ध में अब ‘जी’ लग गया है? अभी भी ज़्यादातर घरों में तहज़ीब के नाम पर घूंघट ओढ़ने का प्रचलन है…अगर यही सवाल उल्टे तौर पर पुरुष से पूछा जाये कि वो अपनी आँखें झुका क्यों नहीं लेता कि “बेटी जैसी” को घूंघट में ना रहना पड़े तो क्या होगा…हमारे सभ्य समाज की पोल खुल जायेगी…सोच कर देखिये कि आपके चेहरे को ढक देने पर आपका सांस लेना दूभर हो जाता है मगर ये संजीदगी उसके लिए क्यों नहीं…इज़्ज़त के नाम पर ढकोसला!

बिटिया का मायका अब संस्कारों की चादर ओढ़े हुए ‘जी’ हुज़ूरी में लग गया है…साले साहब उम्र में बड़े हो कर भी अपने कम उम्र के जीजा ‘जी’ के चरण स्पर्श करके अपनी बहन की ख़ुशियों का व्यवहार मांग रहे हैं…उम्र से छोटी काफ़ी छोटी नन्द ‘जी’ के पाँव छू कर बिटिया(जिसकी अस्मिता ही चकनाचूर हो चुकी है) अपने आप को सौभाग्यवती समझ रही है…जहां पर दामाद जी के बिटिया के घर आने पर हर दफ़े लिफ़ाफ़ा और बिटिया की बिदाई पर फिर लिफ़ाफ़ा मिलता है…क्या मायके का दम नहीं घुटता है??? वक़्त गुज़रते गुज़रते ये सारी प्रक्रियाएं सामान्य होती जाती हैं

गिला इस बात का नहीं कि ये इक घर का सिला है, अफ़सोस कि ये घर घर का सिलसिला है! कड़वी बात है कड़वी तो लगेगी ही…बेटी जब नन्द बनती है तो सदियों की ये कुरीतियां उसके दामन में जाने कैसे बैठ जाती हैं…सास जब माँ है तो अलग है और माँ जी बनते ही इक़दम अलग है! और वक़्त गुज़रते गुज़रते वही बिटिया माँ से माँ जी का, बहन से नन्द जी का और बेटा, लड़के से दामाद जी का पापा से पापा जी का सफ़र कितनी सहजता से तय कर लेते हैं जैसे कि ये बेहद साधारण सी आम बात हो…

ज़रा भी अहसास नहीं होता कि कैसे उन्होंने ये सब होने की अनुमति दी है स्वयं को, क्या उनका भरम उन्हें धिक्कारता नहीं है? फिर उनके ज़हन में ये कुंठा घर कर जाती है कि ऐसा मेरे साथ हुआ है तो मैं भी आने वाली पीढ़ी के साथ करूंगी/करूंगा, और ये ना ख़त्म होने वाला सिलसिला जारी है सदियों से और जारी रहेगा सदियों तलक अगर हम अब ना चेते!

चेतना अगर जगी नहीं तो ये तय है कि हम समाज की सबसे सुदृढ़ इकाई ‘परिवार’ को छिन्न भिन्न कर देंगे, या यूं कहें कि छिन्न भिन्न कर ही दिया है…किसी भी जागृत समाज की सबसे बड़ी कुंठा है ये…इन्हीं कुंठाओं के रहते ‘निर्भया’ जैसे निर्मम हादसे होते रहते हैं आज भी और बावजूद इसके हम अपनी मूढ़ता को ओढ़े हुए संस्कारों का ढोल बजाते रहते हैं…नहीं चाहिये ऐसा समाज और उसमें पनपती हुई वीभत्स विकृतियां!

ना पढ़ने का शौक़ ना समझने की शक्ति ना सत्संग ना ही कोई उमंग…वही दिनचर्या कि उठे मुँह धोया कुछ चरा और दिन भर कोसा और ख़ासकर उनको जिन्होंने हमारा दामन झँकझोरा, हर अपने पराये को…सिवाय स्वयं के… क्योंकि स्वयं को समझने के लिये अहं का त्याग आवश्यक है! अपने कामचोर मन को जगाने का कार्य है, याद रखिये ये आज का समाज है, इसमें ये सब क्यों बर्दाश्त हो…सोचिये और गहरे उतरिये अपनी सोच में…कोई करिश्मा ना होगा, ख़ुद पर काम करना होगा…बरसों की तंद्रा को तोड़ना होगा, स्वयं के कुंभकर्ण को चेतात्मक अवस्था में जागृत करना होगा!

इक्कीसवीं सदी में भारत की यही तस्वीर देखनी है क्या? दुनिया जहान में इन कुंठाओं की प्रस्तुति करनी है क्या? जग हसाईं का सबब बनना है क्या? ग़र नहीं तो हल्ला बोल इन कुरीतियों पर हल्ला बोल ख़ुद की सोच पर…बदल स्वयं को वरना ये काल काल बन कर छायेगा तू कहीं का ना रह पायेगा…मुआफ़ नहीं करेगा हमको कभी भी आगे आने वाला ज़माना और फिर कोई ‘मनुशरद’ इन्हीं विकृतियों का ज़िक्र कर रहा होगा अगली सदी में भी…

बाक़ी पाठकों पर छोड़ा…ग़र लगे कि कोई सार है इन बातों में तो इन्हें सारगर्भित कीजिये वरना ‘जी’ जैसे चल रहा वस्तुतः वैसे ही चलने दीजिये क्योंकि मूर्खता चेहरे पर झलकती है बिना कोई शब्द कहे भी…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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