दर्जनों में दर्द,
सैकड़ों में ख़ुशी,
जो कुछ बची,
ज़िंदगी ही होगी…
आसमाँ बिछा कर,
चादरें समेट लीं,
पैर पसारने की,
जगह नहीँ छोड़ी…
पी गये हैं दरिया,
समंदर है बाक़ी,
छोटे से हलक़ की,
देखो तो चालाकी…
फ़लक़ पे चमके,
बिजली कड़की,
जुगुनू हैं जलते,
चमकाने धरती…
ए फैले हुये आसमाँ,
आसरा है अब तू ही,
क्योंकि जमीं पर,
आशियाँ बचे नहीँ…
आवाज़ किये बिना,
कैसे बजती चुटकियाँ,
कैसे भला सहे कोई,
ख़ामोश ख़ामोशियाँ…
नज़दीकियों में दूरी,
हैं कहाँ से आती,
जितना भी बुझाओ,
प्यास बढ़ती जाती…
गुलों के शहर में,
काँटों का बस्ती,
जितना ही बचो,
उतना ही चुभती…
कहीँ कुछ कमी,
रह ही गयी होगी,
वरना बस यूं ही,
फांस नहीं गड़ती…
परत दर परत,
धूल थी बैठी हुई,
ताक़ में रखी मिली,
शिक़ायतें मुचड़ी हुई…
बीच सबके बैठ,
बातें हुईं बड़ी बड़ी,
ज़माने बीत गये,
बातें वहीं की वहीं…
और जब निकली,
फिर हाथ ना आयी,
है तो ज़िंदगी ही,
वजह नहीं बताई…
चुल्लू भर पानी,
प्यास है बुझानी
मनु ने देखी भाई,
आंसुओं से सिंचाई…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava