गुज़र रहे थे उस गली,
जो थी वीरान पड़ी,
सामने थी वो खड़ी,
अकस्मात् देख उसे,
हमने पूछा कौन हो,
वो बोली…ज़िंदगी!
हमने कहा किसकी?
वो बोली…तुम्हारी…
हाथ पैर कांपने लगे,
सिहरन सी दौड़ गई,
कैसी घड़ी आन पड़ी,
किसने ही है देखी,
ख़ुद अपनी ज़िंदगी,
सांस भर हमने कहा,
झूठ है जो तुम बोली,
ज़िंदगी है किसने देखी,
नहीं पता वो कहां रहती?
मुस्कुरा कर वो बोली,
जबसे तुमने आंखे खोली,
पहले पहल हैं सांसें भरी,
उसके बाद तुम्हें कभी,
हमसे मिलने की,
फ़ुरसत ही नहीं मिली,
क्योंकि तुम मसरूफ़ रहे,
देखने दूसरे की ज़िंदगी,
उसको आंकना, मापना,
भांपना, झांकना, नापना,
और सलाहियत देनी…
जो मैं हूं अब सामने खड़ी,
पर तुम जानते ही नहीं,
हमको पहचानते नहीं,
इक दो घड़ी ही सही,
मुझसे भी मिल लो कभी,
फिर वो आहिस्ते बोली,
आख़िर हूं तुम्हारी ज़िंदगी,
शायद तुम घबरा गये हो,
देख कर मुझे सामने खड़ी,
मगर मैं क्या ही करती?
तुमने मन में अपने ही,
खुलकर झांका ही नहीं,
झांकते तनिक तुम अगर,
तुमको मिल जाती ख़बर,
के मैं तुममे सांसे हूं भरती,
तब तुम्हारी नब्ज़ धड़कती…
तुम जो इतना घबराते हो,
मुझसे जो तुम क़तराते हो,
कितने हो कमजर्फ़ तुम,
नहीं मगर हमदर्द तुम,
तुमको मैं क्योंकर चाहूं,
तुमको मुझको है पाना,
मैं तुमको क्योंकर पाऊं,
देखो तुम ठौर और कोई,
मुझसे ही बड़ी भूल हुई,
कुछ वक़्त बदला कुछ…
हम बदले, के अचानक ही,
देखते देखते इक पल में ही,
यक़ायक़ ही सांसे थम गईं,
ज़िंदगी…ओ ज़िंदगी ए ज़िंदगी,
हम पुकारते ही रह गये,
पर वो छोड़ कर चली गई…
जाने के बाद जो है होता,
बस इकदम हुआ वही,
रो रो के हुआ हाल बुरा,
हिल डुल तो रहा था अभी,
अभी जिस्म निढाल सा पड़ा,
लगा देख रहा कोई सपना,
चला गया कोई था अपना,
मैं था, हुआ नहीं यक़ीन ज़रा…
चार लोगों ने दे कर कंधा,
लिटा दिया अंतिम चिता,
दो घड़ी में कर दिया विदा,
सामने मेरी लाश थी पड़ी,
बांधे टकटकी रूह थी खड़ी,
बात हाथ से निकल चली,
अरे…ज़िंदगी…अरे ज़िंदगी,
क्या कहूं जब तलक तुम थीं,
लगा था सदा साथ तुम रहोगी,
पर अब पछताये होता है क्या,
अरे काटा वही जो था बोया,
जब तुम हमसे थी कहती,
मिल तो लेते इक दो घड़ी,
हमने हमेशा कहा था तुमसे,
इतनी जल्दी भी क्या है,
अभी तो सारी ज़िंदगी है पड़ी,
चलो आ गई चलने की घड़ी…
मौक़ा मिला, फिर मिलेंगे कभी!!!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava