दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १५
यूं जाने का मन तो था नहीं, पर था भी वहां से,कभी कभी कुछ अनुभूतियों को स्वीकारने में,ख़ुद के साथ वक़्त चाहिये उसे जज़्ब करने …
यूं जाने का मन तो था नहीं, पर था भी वहां से,कभी कभी कुछ अनुभूतियों को स्वीकारने में,ख़ुद के साथ वक़्त चाहिये उसे जज़्ब करने …
अगले दिन पहुंच गई मैं जल्दी, उनके आने से,पर मैं ये भूल गई थी कि जाना है पहले पढ़ने,उनसे तो मिलेगें अब हम सारा दिन …
बात हद से गुज़र जाये, तो बात नहीं रहती,रात, भरे पूरे दिन में कभी रात नहीं रहती,बादल आ के ढांप ले उजला उजाला अगर,और बरस …
उन्हें गये, काफ़ी दिन गुज़र चुके थे,हालत में बेचैनी थी उनके इंतेज़ार में,इंकार कि इक़रार नहीं सोच रही मैं,बस एक ख़ुमारी चढ़ी हुई थी मुझपे,परेशानी …
कहते हैं कोशिशें कामयाब होती हैं,कोई क़सर ना रखी क़ोशिश करने में,निकले ही थे पढ़ के उनकी कक्षा से,आवाज़ आयी, अरे अंबरीन ज़रा सुनो,क्या कहा? …
अगले दिन रोका उन्होंने देख कर मुझे,वो बोले कि मतलब क्या है अलग से?हमने कहा विषय कमज़ोर है मेरे लिये,कहा उन्होंने ठीक है सोच कर …
गुलज़ार होती हुई ज़िंदगी है सामने,उस कक्षा का रोज़ इंतेज़ार रहता है,तक़रीबन इक महीना आया गुज़रने,अभी तलक बात कुछ भी हुई नहीं है,जैसे उफ़नती नदी …
फिर यूँ हुआ इक दिन विश्विद्यालय में,पहला पहला दिन था उसके प्रांगड़ में,मैं जा रही थी एम ए की कक्षा में बैठने,समय हो चला, तेज़ी …
पुरानी बात है और है भी सच, किसी की आंखो देखी है शायद, और हर कालखंड के लिए सार्वभौमिक लगती है… बया के बच्चों को …
हां, बनारस शहर की ख़ास बात है ये,यहां की बोली में गज़ब की मिठास है,जब कभी लगे के दिल बड़ा उदास है,तो उल्टी बहती हुई …