कैनवास पे रंगों के छींटे यूं हैं उड़ेले,
के ज़िंदगी ने कहा चलो इनमें रंग भरें,
आबशारों को देख रहे उल्टे पड़े हुए,
लगे के जैसे आसमां पे हों चढ़ रहे,
गर्मियों की रात तारों को तकते रहे,
आंखों आंखों में गुज़री, औंधे पड़े रहे,
सुफ़ेद ठंडी चादर पे पैर फिसला के,
मुलायम सरसराहट पे गुनगुनाते रहे,
ख़ूबसूरत फ़िज़ाओं में बहका किये,
हम उनके वो हमारे, सिलसिले बहे,
अब जबसे जीने लगे हैं जी भर के,
कहकशां खिलने लगा आसमां परे,
ऐसे तो नहीं देखे थे कई ज़माने से,
इतने ख़ूबसूरत होते हैं आज़ाद सवेरे,
नागंवार गुज़रे दिन कुछ वक़्त पहले,
अब ये आलम है कि गाल सुर्ख़ हो रहे,
ग़ुलाम आज़ादी के असर कोई पूछे,
असला गरदन पे औ हंसते बोलते रहे,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava