ज़िंदगी का बंदर,
दिखता है बाहर,
रहे चित्त अंदर,
हाय रे ये बंदर…
मन को खींचकर,
आंख को भींचकर,
चाहता नहीं देखना,
वीभत्स होती नज़र,
लगा बुलाने चीख़कर,
अपने अंदर का बंदर,
वो खींसे निपोड़ रहा,
खीझा सा दिख रहा,
मुंह बना चिढ़ा रहा,
नक़ल रहा उतार,
जैसे कुछ हुआ नहीं,
ख़ुद को रहा संवार,
ये ज़िंदगी का बंदर,
जब बैठे कंधे ऊपर,
नशे में बने ये झूमर,
झूमे छत के नीचे,
या छत के उपर,
आमतौर पर,
लटके है उल्टा,
सीधा सोचे ना,
सब जानबूझ कर,
ये ज़िंदगी का बंदर,
शायद सबके अंदर…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava