ज़िंदगी की सरजमीं पर...
प्याज!!!
प्याज!!!

प्याज!!!

जिंदगी ब्याज पे और प्याज पे चलती है,
छौंके साथ में लौकी आलू मेथी बनती है,

आलू रोजमर्रा की दिनचर्या की सब्जी है,
बाकी सब्जियां उसी में घुलती रहती हैं,

दुनिया आलू सब्जी है घुलती मिलती है,
मगर प्याज के बगैर आंखें कब धुलती हैं,

प्याज हो मिला ब्याज, जिंदगी निखरती है,
कच्चा प्याज ज्यूं चढ़े ब्याज तो अखरती है,

ना हो रोज की हलचल में कमी खलती है,
प्याज आसूं ना लाये जिंदगी आंख मलती है,

ब्याज प्याज से ही तो राजनीति चलती है,
दाम बढ़ने भर से ही तो सरकारें गिरती है,

प्याज बहसों का हिस्सा औ किस्सागोई है,
प्याज हरजाई है पीढ़ियां ये कहती आई हैं,

मनु कहते हैं के प्याज की क्या गलती है,
जिसकी लाठी आख़िर उसी की चलती है,

आंखों से जो रुला दे प्याज बड़ा बेदर्दी है,
आसूं गिरते पर वो हंसा दे बड़ा नरमी है,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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