मनु शरद

ज़िंदगी की सरजमीं पर...

मनु शरद

हूँ!!!

अंजानी हूं,जानी जा रही हूं ,निर्भीक हूं,पहचान बना रही हूं,खोज हूं,ढूंढी जा रही हूं,श्वास हूं,जीवंत कहला रही हूं,स्पंन्दन हूं,कंपन्न बढ़ा रही हूं,दृश्य हूं,दृष्टा बनना चाह …

ओस!!!

ओस ठहरी टहनी पर,टहनी लोच से भर गयी,ज़रा सी हलचल हुई,ओस ज़मीं पे टिक गयी, ज़मीं भी लगी कहने,ठंड में क्यों कुड़क रही,ओस ने फिर …

पितृ-सत्तात्मक समाज का अंतर्द्वंद!!!

उसने कहा अपने घर आ कर,कि मैं अपने घर से आ रही हूं,मुझे दो पल लेने दो सुकूं ज़रा,बेहद थकी हूं, टूट के आ रही …