ज़िंदगी की सरजमीं पर...
Manu Sharad

आज़ादी!!!

ख़ुश हैं हम, अपने वतन में हैं हम,आज़ाद हैं हम, आबाद हैं हम,बस थोड़ा बहुत परेशान हैं हम,कुछ आदतें हैं जो बदलनी हैं,कुछ रवायतें हैं …

दिल!!!

किसी की थी महफ़िल,महफ़िल में उनसे मिल,हैं वो नफ़ीस शख़्सियत,इक दिन पूछा उन्होंने,कौन हो तुम,हमने कहा आपका दिल, क्या मिलेगा याद करके,जो ना गुज़ारे साथ …

अपने अपने सच!!!

आदम की बस्ती में है मौकापरस्ती,हर इंसान, इंसान में इंसान ढूंढ़ते हैं, कितनी सफाई है ज़ुल्मों में उनकी,कराहते हुए  दर्द,  ज़ख्म ढूंढ़ते हैं, समन्दर में …

मझधार!!!

इक कश्ती बहकती रही मौजों में,साहिल को बुलाती रही लहरोँ से,मौक़ा देख कर निकल है भागती,लौटना चाहती नहीं वो किनारों पे, उसे पसँद है दांव …

लखनऊ!!!

बे इंतेहा सर्फ़ी सा दुकानदार,सौ साल से भी पुराना व्यापार,पैंतालीस अंश का था तापमान,पारा चढ़ा जा रहा था आसमान,पूछा कि कहां है “सेवा” की दुकान,यहीं …

मुद्रा देव!!!

त्रैता युग ने,रामायण रचाई,और द्वापर में,महाभारत रच आई,आदमी को आदमी की,सुध शायद ना आई… कलयुग ही है ऐसा,जिसमें बोलता पैसा,पैसा खेल अनोखा,पैसे ने  है सिखाया,ये …